Sorry

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अरे खुलकर बोलो सॉरी ।
ये क्या छुप के बोल आये ।
थोड़ा अदब से जनाब ,
थोड़ा और अदब से
गला नही कटता झुकने में
दर्द नही होता घुटनों में
आहिस्ता से बोल भी दो
नरम आवाज़ में
नहीं बोल पा रहे
अच्छा साहब
तारीफ़ तो कर लेते हो
बड़े शाहीपन से
रुकते ही नही , थोड़ी देर को भी
हलक सूख जाए तो भी
नही रुकते आप ग़ज़ल फरमाने में
क्यूं नही कह देते उसी लहज़े में
क्या ज़बान में दरार पड़ती है
या फिर ज़माने की आंख से कतराते हो
कभी बेवजह भी सॉरी बोलकर देखो
माफ करेगा वो भी आहिस्ता आहिस्ता ।।

◆Avdhesh

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