किताब-ए-इश्क़

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इत्तेफ़ाकन जो कभी मेरी क़िताब उनके हाथ लगे ।
सफ़े सफ़े पर पत्थर कलेजा भी बाहर निकल पड़े ।।

आंख का काजल लुढ़क जाए नाज़ुक गालों पर ।
आंसू गिरे दमादम, जैसे जून महीने में बरखा पड़े ।।

जब कत्थई हो जाये आंखें खूनी दरिया के बह जाने से ।
तो हाथ उठें ऐसें, जैसे माह ए रमज़ान में कोई नमाज़ पढ़े ||

किताब को कलेजे से इस कदर वो चिपका के घूमे ।
जैसे दर्ज़ी हसीना के दामन में कोई बेशकीमती हीरा गढ़े ||

-Avdhesh

 

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