किसका है …

 

ये अँधेरा शब का नहीं है तो फिर किसका है |

अँधेरे में रखा दीया तेरा नहीं तो फिर किसका है ||

 

आज मेरी तरफ ही बढ़ रही है आग़ न जाने क्यों |

आग़ में पतंगा तेरा नहीं है तो फिर किसका है ||

 

आज अदब से सर झुक रहा है इतने दिनों बाद |

ये सजदा अगर रब का नहीं तो फिर किसका है ||

 

राह में चलते हुए निशान ए इश्क मिला है जैसे |
 ये पत्थर मंजिल का नहीं तो फिर किसका है ||

 

स्याह रात में बैठकर एक ख़त लिखा गया था |

ये आखिरी ख़त भी उनका नहीं तो फिर किसका है ||

 

©Avdhesh 

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