माँ

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जब दुख के बादल तुमसे ज्यादा ऐंठे ।
तब माँ के आँचल को सर पर लपेटें ।।

गुलशन जो आज इतरा रहा है खूबसूरती पर ।
पहले अपनी माँ का शुक्रिया अदा कर के लौटे ।।

हसीनों की ज़ुल्फ़ों तले क्या मिला है किसी को ।
खुशी चाहने वाला बेझिझक माँ का दामन ओढ़े ।।

क्या सूफ़ी और क्या पंडित के पैर पकड़ता है ।
गर जन्नत की तलब है तो माँ के पैर धो लें ।।

लगता है कि तकलीफों ने अपना कद बढ़ा लिया है ।
उन्हें कहो कभी मेरे माँ के सिरहाने आकर बैठें ।।

मातृ दिवस पर मेरी अंग्रजी में रचना भी पढें , यहाँ क्लिक करें

© Avdhesh

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14 thoughts on “माँ

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