…देखा है

 

ए हसीं , हुस्न पर इतना गुरूर नहीं अच्छा |

के मैंने चाँद को भी झुलसते देखा है ||

वो जुगनू जो कभी ज़मीन पर उतरा ही न था |

उसे चुपके से मैंने अपने पर बदलते देखा है ||

जो नज़र पहली दफा में ही  गुलाम बना लेती थी |

उस नज़र को भी  मैंने खामोश होते देखा है ||

जो बेजज्बाती होने में मशहूर थे बड़े |

उन्ही लोगों को मैंने खुदकुशी करते देखा है ||

ताउम्र जिन्होंने हाथ में तलवार पकडे रखी |

उनको भी मैंने नाज़ुक ग़ुलाब पकडे देखा है ||

जो लोग उर्दू से कोई वास्ता नहीं रखते |

उनको भी मैंने बड़े शायर बनते देखा है ||

-Avdhesh

 

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