पता ही न चला

बड़े सलीके से लोग यहाँ बड़े हुए कि पता ही न चला |
दामन कब दागों से भरा कि पता ही न चला ||

एक परछाई की आस में बैठा रहा मैं उम्र भर |
कब आतिश-ए-इश्क़ से जल बैठा , पता ही न चला ||

होशियारी का लबादा ओढा तो ओढा सदियों तक |
कब इक पल में सब ख़ाक हुआ , पता ही न चला ||

जब छुपा के रखा तो मजाल है की ज़बान खुल जाये |
और कब सरेआम करने लगा ,पता ही न चला ||

सच के मामले में मैंने गाँधी का दामन थामा |
और कब दुनिया झूठी हुई , पता ही न चला ||

कोई किसी कि फिक्र बेवजह नहीं करता यहाँ |
मैं क्यों यहाँ फ़रिश्ता बनने लगा , पता ही न चला ||

तरक्की की राह में हर फालतू चीज़ छोड़ी मैंने |
कब कोई मेरा दूर हुआ मुझसे , पता ही न चला ||

फलक की बुलंदियों पर नज़र गड़ाई रखी हमेशा |
कब पैरों तले ज़मीन खिसकी , पता ही न चला ||

यहाँ दिल निकाल के रखो तो भी कोई परवाह नही करता |
इक नज़राने को क्यूँ संभाला मैंने , पता ही न चला ||

मेरी आँखों के सामने उन्होंने आसमान छुआ है |
और कब इतने बड़े हुए , पता ही न चला ||

वो जो कहते तो कामयाबी का सेहरा उनके सर बंधवाता |
तरक्की की राह कब छोड़ी उन्होंने , पता ही न चला ||

ख़ूबसूरत गुलों के बीच इक भंवरा बेदाग़ रहा आज तक |
इक सादा फूल कब आँखों में बसा , पता ही न चला ||

अब आग़ लगती है उनके आँचल में मेरे अल्फाजों से तो बेशक़ लगे |
उस शम्मा की लौ से मैं भी कब का जल गया , पता ही न चला ||

Avdhesh

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4 thoughts on “पता ही न चला

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  1. बहुत ही अच्छी कविता है. खास कर ये पंक्तियाँ-

    सच के मामले में मैंने गाँधी का दामन थामा |
    और कब दुनिया झूठी हुई , पता ही न चला ||

    Liked by 1 person

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